सांभा की कलम से…

कल फिर एक बार शोले फ़िल्म के दर्शन हुए। फिर हमेशा की तरह देर रात सपने में सांभा आया और उसका दुखड़ा रोने लगा। बोले भैया कभी तो हमारे दिल का भी दुनिया को सुनाओ, तो फिर आज मैंने भी लिख ही डाला। फिर वही रोने लगा कि भैया ऊपर पहाड़ी पर की दुनिया बड़ी अजीब है, गब्बर भाईसाहब की परेशानिया बड़ी छोटी लगती है ऊपर से। कभी गांव वालों से अनाज न आ पाने की दिक्कत, तो कभी पुलिस की टेंशन। हमदर्दी तो बहुत है मुझे गब्बर भाईसाहब से पर क्या करूँ मजबूरी का मारा हूँ, आखिर ऊपर बैठने वाले लोग कर भी क्या सकते है, हम सिर्फ देख सकते है नीचे वाले लोगो को दुखी होते हुए। हाँ जब भी गोली चलानी हो तो जरूर मैं चला देता हूं, अब चाहे निर्दोष हो या गरीब क्या फर्क पड़ता है आखिर भाईसाहब का नमक खाते है। अब हमें भी तो सब में से चुन कर ही ऊपर बैठाया है ना, तो धर्मनिरपेक्षता की गोलियां गले मे लटकाये , आरक्षण की बंदूक से उन्हें चलाने का मज़ा भी अब मुझे आता है। खैर ये सब बकैती आगे भी मेरी जारी रहेगी, कुछ अगले सपने के लिए बचा कर रखते है… जय जय ।

– इंद्रदत्त व्यास

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सच्चे बहाने

आओ कुछ सच्चे बहाने बनाये ,

जो कुछ अन्तर्मन के झूठों को छुपाये…

सच कहना आसान है लेकिन, कोई अपना इसे नही पाता है,

झूट चाहे कितना भी कड़वा हो, सबके मन को भाता है…

आदर सहित कहा गया सच, कितना दिल को चुभता है,

और आत्मीयता से कहा गया झूठ, मन प्रफुल्लित कर उठता है…

बहाने अगर सच्चे हो तो चोट ज़रा कम लगेगी,

वर्ना झूठ की दीवारें तो हरदम गिरा करेंगी…

मैंने भी कुछ सच्चे बहाने बनाये है,

जो कई कड़वे झूठो को ढकते आये है,

कभी लगे बुरा मेरे बहानो का तो , नाराज़ भले हो लेना तुम,

पर सच्चे झूठ की तलाश में, कोई अपना मत खो देना तुम…

– इंद्रदत्त व्यास

वंदन

मन चंदन तो तन कुंदन, कुछ उनका भी वंदन हो,

सुन सको पीड़ा उनकी , ऐसा ही उनका क्रंदन हो…

सर्वनाशी औलादों ने उनका ही संहार किया,

मार उनकी आशाओं को, कलयुगी अवतार लिया…

जो नर्कलोक को जाता हो, वो द्वार बना कर क्या पाया,

जो स्वर्गलोक बन सकता था वो घर उजाड़ कर क्या पाया…

क्या भूल गए वो त्याग की रातें, जब माँ भीगी , तुम सोये थे,

चोट लगी थी जब तुम्हे, देखकर पापा भी तो रोये थे…

टूटी ऐनक, टूटी चप्पल, सब्र बेचकर घुटते रहे,

औलादी सपनों के खातिर हर पल ही वो लुटते रहे…

आवाज़े बीवी की माँ से ऊंची कर के क्या पाया,

जो स्वर्गलोक बन सकता था वो घर उजाड़ कर क्या पाया…

याद रखो जीवन ने फिर से माँ बाप नही मिल पायेंगे,

सब कुछ मिल जाएगा लेकिन पाप नही धुल पाएंगे…

पैसा, धन – दौलत मोल नही रखता कुछ भी उनके आगे,

मत खींचो इतना उनको की टूट जाये पक्के धागे…

अपनी खुद की औलादो से ये सब सहने से बच जाओ,

वक्त अभी भी बाकी है तुम जाकर चरणों मे झुक जाओ…

इतना तो करलो जब पूछे कोई की क्या खोया और क्या पाया,

तो कह सको की माँ – बाप से ज्यादा इस दुनिया मे कुछ नहीं पाया…

– इंद्रदत्त व्यास

मोज़े पागल है…

“बोल के लब आज़ाद है तेरे” कानों में गूंजा और ठनक पड़ी की आज़ादी के नारों से पैर मेरे नाराज़ हो गए…बोले मोज़ों से आज़ादी दो, अब भला मोज़े भी चढ़े हुए थे, तन कर बोले कि मिट्टी और पसीना हमने भी खाया पिया है, हम उतरेंगे तो नहीं…पैर ने दलील दी कि भैया तुम भेदभाव करते हो, किसी की रक्षा तो किसी का रूप खराब करते हो…जूतों से इज़्ज़त बचाने के लिए हम तुम्हे पहनते है और आप है कि हमे दुर्गंधित करने से बिल्कुल भी नही बचते है…गुलामी मानसिकता के ही सिर्फ तुम कायल हो, तुम मोज़े तो सब के सब पागल हो…मोज़े सब चुपचाप सुनकर के अंत मे बोले, हमारी बनावट इंसान की तरह ही झोल झाल वाली है, कोई शुद्ध कॉटन तो कोई सिर्फ जाली है…हमे न पहनो तो होली और पहनो तो दिवाली है…फटे हुए छेद हमारे निर्बल और घायल है, हाँ पैर भैया, हम मोज़े सच मे पागल है..सच में पागल है…

(परम मित्र “ऊर्जा” के ख्यालातों पर आधारित एक सच्चा वाकया )

एहसास

ढलती हुई रात ने उगते हुए सूर्य से कभी तो ये कहा होगा,

की सिर्फ कटती हूँ मैं और गुज़रते हो तुम, क्या ये एहसास तुम्हे भी कभी हुआ होगा…

सितारों ने देखी है मेरी बेबसी, मेरा अकेलापन, मेरी ख़ामोशी, मेरा चुप रहना,

तुम्हारे आते ही उनका ओझल हो जाना संकेत है उनकी नाराज़गी का,

तुम्हारे तेज से बेचैन धरती के बाशिंदों को कभी तो मैंने बचाया होगा,

कभी तो जाते हुए मेरी ठंडक का एहसास तुम्हे भी सुहाया होगा…

अब तुम्हारे आने का ग़म और जाने की खुशी होने लगी है,

मेरे दामन से तुम्हारे आगोश तक आती चिड़िया भी अब रोने लगी है,

क्यूँ हम पहले की तरह एक दूसरे में समा नही सकते, क्यूँ हम सारे गिले शिकवे भुला नही सकते,

फिर से उसी दौर में लौट जाने का ख्याल तुम्हे भी तो आया होगा,

अधूरे है हम एक दूजे के बिना इस बात का एहसास तुम्हे भी कभी हुआ होगा…

गलत लगती है..

एक यही बात तेरी मुझे बड़ी गलत लगती है,

तू क्यूँ मुझे सबसे अलग लगती है…

तुझे देखूं तो मुझको एक डर लगता है,

कोई अपंग जैसे बिना पैर के सिर्फ सर लगता है,

तुझे चख लूँ तो मुझको ज़हर लगता है,

पसीना भी मेरा तर बतर लगता है,

तुझे सुन लूँ तो मुझको फ़िकर लगता है,

जैसे खाली तवे पर बटर लगता है,

तुझे महसूस करू तो एक ऐसी तलब लगती है,

श्मशान में सांझ की जो अलख जगती है,

बस एक यही बात मुझे तेरी गलत लगती है,

तू क्यूँ मुझे सबसे अलग लगती है…अलग लगती है…

– इंद्रदत्त व्यास

एक लाइटर की आत्मकथा

मैं लाइटर हूँ… मैं भी शोषित और पिछड़े समाज का एक हिस्सा हूँ… हर वक़्त दबाया और जलाया जाता हूँ… दर्द मुझमे भी भरा हुआ है, गैस की तरह… मेरा दर्द खत्म होने पर लोग फिर से दर्द भर देते है मुझमे या फेंक दिया जाता है…मुझे फेंक ही दिया जाए तो अच्छा है…फट जाने पर स्वर्ग सिधारूँगा…जिंदा रहा तो जलता और लोगो को भी जलाता ही रहूँगा…हे इंसान तू उच्च कोटी का प्राणी है…मेरी ये जवानी सिर्फ तेरे ही काम आनी है…तू अपने फेफड़ों के साथ मुझे भी जला रहा है…तू नादान है, सिर्फ धुंआ उड़ा रहा है…

– इंद्रदत्त व्यास