रोमांटिक कविता

अरे नहीं..नहीं..ये हमारा काम नहीं,

इस शीर्षक पर लिख सके इतना हमारा नाम नहीं,

आज के दौर में मोहब्बत सबसे ज्यादा बिक रही है,

इसलिए सबसे ज्यादा कलमें, आजकल इसे लिख रही है,

हमने भी सोचा कि इसपर कुछ लिखने का प्रयास करें,

की हम भी थोड़ा मोहब्बत का एहसास करें,

गर कुछ लिख पाए फिर तो मालामाल हो जाएंगे,

और ना भी लिख सके तो एक बुरी मिसाल हो जाएंगे,

पर हमेशा की तरह ये हमे फिर से रास न आई,

जीवन मे भर भर के ये नीरसता ले आई,

जहां हमारे अच्छे भले मस्त हाल थे,

अब मोहब्बत करते ही हम बिल्कुल बेहाल थे,

जीवन समस्याओं से घिर चुका था,

दिमाग हर जगह से फिर चुका था,

तब हमें ये आभास हुआ कि हम इस लायक नही,

सादा जीवन इतना भी भयानक नहीं,

रोमांटिक कविता लिखने के चक्कर में इतना कुछ झेल गए,

की हमारे सारे जमे जमाये रायते फैल गए,

अब बारी फिर से संभलने की थी,

कोशिश इस दलदल से निकलने की थी,

जैसे तैसे हमने इससे पीछा छुड़ाया,

कुछ अच्छा लिखने का मूड बैठाया,और आखिरकार आपके सामने कविता लेकर आया,

क्योंकि प्रेम यही है जो आपके और मेरे बीच है,

बाकी ज्यादातर मानसिकताएं आजकल नीच है,

मैं मोहब्बत के खेल में भी जिताऊ न था,

मैं रोमांटिक कविता ना लिख सका, क्यूंकि मैं बिल्कुल भी बिकाऊ न था…

– इंद्रदत्त व्यास

मोटा रहने दो…

मेरे बढ़ते वजन को लेकर घर वाले परेशान हो गए,

जैसे नोटबन्दी से त्रस्त सारे बेईमान हो गए,

हमने मोटापा घटाने की खातिर बड़े ठोस कदम उठाए,

पर वो कदम इतने ठोस थे कि उठ ही न पाए,

मेरे मोटापे की बिल्कुल ही अनूठी कहानी थी,

लगता था जैसे उस पर लाचार सरकारी तंत्र की निगरानी थी,

वक़्त के साथ साथ मेरा पेट और आगे बढ़ गया था,

जैसे भरष्टाचार और घोटालो से उभर गया था,

सभी दवा और मिन्नते फेल हो गयी थी,

जैसे किसी ईमानदार नेता को जेल हो गयी थी,

मेरे मोटापे से मैं मायूस हो चुका था,

जैसे किसी पूर्व प्रेमी की तरह यूज़ हो चुका था,

फिर एक दिन आखिर मैंने ठान ही लिया,

घरवालो का कहना मान ही लिया,

मैंने वर्जिश की शुरुआत कर दी थी,

सारी इच्छाएं एक तरफ धर दी थी,

मेरा मोटापा अब घटने लगा था,

जैसे हरा भरा पेड़ कोई कटने लगा था,

लोग मुझे देखकर के बड़े हैरान थे,

जबकि असल मे वे बड़े परेशान थे,

की इसका मोटापा ऐसे कैसे घट गया,

जैसे विपक्ष का नेता कोई पट गया,

सब खुश थे, अकेला मैं परेशान था,

दुनिया मे दुख दर्द के बढ़ने और मेरे मोटापे के घटने से हैरान था,

इसी चिंता में मैं फिर से मोटा होने लगा,

पर परेशानियों का खाता अब थोड़ा छोटा होने लगा,

मैंने सोचा की अब दुनिया के ताने सिर्फ तभी सुने जाएंगे,

जब इस दुनिया मे छलावे के पैमाने ज़रा कम हो जाएंगे,

मेरे मोटे पेट से बड़ा इस दुनिया में फैला पाप है,

और इस हिसाब से मेरे मोटापे का कारण सिर्फ आप है,

जिस दिन सब झोल झाल यहां से खत्म हो जाएगा,

उस दिन मेरा मोटापा भी अपने आप खत्म हो जाएगा,

तब तक इस दुनिया को ऐसे ही चलते रहने दो,

मैं मोटा ही खुश हूं, मुझे मोटा रहने दो…मुझे मोटा रहने दो…

इंद्रदत्त व्यास

एक आग चुनो…

क्यों रुकते हो, मत डरो अगर तुम गिर जाओ,

एक आग चुनो, और उसी में जल जाओ…

क्या हुआ अगर जो हार गए तुम इक दिन से,

है और भी मौके , क्या वो दिन बड़ा है इस जीवन से,

क्या हुआ अगर जो पाना था वो ना पाया,

क्या हर जंग सिकंदर भी कभी जीत पाया,

क्या हुआ जो जीती बाज़ी हार गए तुम,

फिर शुरू करो उस जंग को जो हार गए तुम,

तोड़ो निराशा की बाधाओं को, मशालें हौसलों की तैयार करो,

मिला है सिर्फ एक ही जीवन, मुँह लटका कर के मत बेकार करो,

क्यों रुकते हो, मत डरो अगर तुम गिर जाओ,

एक आग चुनो, और उसी में जल जाओ…

एक आग चुनो,और उसी में जल जाओ….

इंद्रदत्त व्यास

कैसे..

जो काम हमे आता नही वो करे कैसे,

जो हम लिख नही सके तो वो कहे कैसे…

उसने कुछ इस कदर ज़िंदा किया है मुझको,

मरना चाहे भी तो हम मरें कैसे…

मजबूरी के सबब तुमको बताएं कैसे,

हाथों में टूटे ख्वाब छुपाये कैसे…

जहां तो फिर भी बदनाम ही करेगा हमें,

हम भी इंसान है ये उनको बताएं कैसे…

– इंद्रदत्त व्यास

शाम हो जाती है…

बेसब्र हूँ, तुझे बहुत कुछ बोलना चाहता हूँ,

पर कुछ बातें बोलने से पहले ही तेरे नाम हो जाती है…

बिगड़ैल हूँ, संभलने की कोशिश करता हूँ,

पर मेरे संभलने से पहले ही मेरी नीयत सरेआम हो जाती है…

जलता हूँ, तुझे गैरो के साथ देखकर,

पर जलने से पहले ही मेरी मजबूरियां हावी हो जाती है…

खुश हूँ, सिर्फ तुझे खुश देखकर,

पर अब कभी तेरा नाम पुकारूं तो सब गलिया वीरान हो जाती है…

चाहत यही रहती है कि आंखे खोलू उजाले में,

पर आंख खोलने से पहले ही शाम हो जाती है…

– इंद्रदत्त व्यास

क्या क्या बोलते हो…

कभी कभी सोचता हूँ कि तुम क्या क्या बोलते हो,

शब्दो के तराजू में तमीज़ को तोलते हो,

और न तुले तमीज़ तो फिर हम पे ढोलते हो,

क्यों ऐसा बोलकर के अपनी ही पोल खोलते हो,

अब पोल खुल गयी तो भी ठीक है, फिर क्यूँ इधर उधर डोलते हो,

ज़रा बैठो, सोचो, विचारो, और आराम करो,

दुनिया का जीना मत हराम करो,

माना कि तुमने सहा है,

हमने भी सबसे यही कहा है,

जंग जीतकर आये हो तो अब कुछ देर विश्राम करो,

घर बैठ कर के जय श्री राम करो,

अपने मन को कभी अगर तुम टटोलोगे,

तो पता नही फिर तुम क्या क्या बोलोगे…

– इंद्रदत्त व्यास

बस रोना मत…

दिल के भर जाने पर और आंखे भर आने पर,

बस रोना मत…

गले के रुंधने पर और विश्वास के टूटने पर,

बस रोना मत…

अपनो के छूटने पर और गैरों के रूठने पर,

बस रोना मत…

ट्रैन में बैठे खिड़की से झांकने पर और प्लेटफॉर्म पर खड़े हुए देर तक हाथ हिलाने पर,

बस रोना मत…

फ़ोन में किसी फोल्डर के खुलने पर और किसी से किसी का नाम सुनने पर,

बस रोना मत…

आखिरी बार किसी से मिलने पर और उसके किसी और के साथ दिखने पर,

बस रोना मत…

पुराने किस्से सुनने पर और उसमें अपने टूटे हिस्से पर,

बस रोना मत…

गर रोना आ भी जाये कभी , इन सब मसलो में,

तो बस याद रखना फिर से किसी के होना मत…

– इंद्रदत्त व्यास

है तो इंसान ही ना…

सपने दिखा कर के तोड़ते भी है ना,

आखिर है तो हम इंसान ही ना…

पर्वत से खड़े है, जिदो पर अड़े है,

मज़हब के नाम पर सभी से लड़े है,

अपने ही कर्मों के अपने तमाशे है,

जिंदा कौन है यहां, सभी तो लाशें है,

अपनो के घर हमने खुद ही जलाये है,

हँस कर के अपनो के अरमान दबाये है,

इंसानियत भी पूछ रही हमसे , की कभी तो मिलो ना,

अब क्या कहे उससे, आखिर है तो इंसान ही ना…

– इंद्रदत्त व्यास

सांभा की कलम से…

कल फिर एक बार शोले फ़िल्म के दर्शन हुए। फिर हमेशा की तरह देर रात सपने में सांभा आया और उसका दुखड़ा रोने लगा। बोले भैया कभी तो हमारे दिल का भी दुनिया को सुनाओ, तो फिर आज मैंने भी लिख ही डाला। फिर वही रोने लगा कि भैया ऊपर पहाड़ी पर की दुनिया बड़ी अजीब है, गब्बर भाईसाहब की परेशानिया बड़ी छोटी लगती है ऊपर से। कभी गांव वालों से अनाज न आ पाने की दिक्कत, तो कभी पुलिस की टेंशन। हमदर्दी तो बहुत है मुझे गब्बर भाईसाहब से पर क्या करूँ मजबूरी का मारा हूँ, आखिर ऊपर बैठने वाले लोग कर भी क्या सकते है, हम सिर्फ देख सकते है नीचे वाले लोगो को दुखी होते हुए। हाँ जब भी गोली चलानी हो तो जरूर मैं चला देता हूं, अब चाहे निर्दोष हो या गरीब क्या फर्क पड़ता है आखिर भाईसाहब का नमक खाते है। अब हमें भी तो सब में से चुन कर ही ऊपर बैठाया है ना, तो धर्मनिरपेक्षता की गोलियां गले मे लटकाये , आरक्षण की बंदूक से उन्हें चलाने का मज़ा भी अब मुझे आता है। खैर ये सब बकैती आगे भी मेरी जारी रहेगी, कुछ अगले सपने के लिए बचा कर रखते है… जय जय ।

– इंद्रदत्त व्यास

सच्चे बहाने

आओ कुछ सच्चे बहाने बनाये ,

जो कुछ अन्तर्मन के झूठों को छुपाये…

सच कहना आसान है लेकिन, कोई अपना इसे नही पाता है,

झूट चाहे कितना भी कड़वा हो, सबके मन को भाता है…

आदर सहित कहा गया सच, कितना दिल को चुभता है,

और आत्मीयता से कहा गया झूठ, मन प्रफुल्लित कर उठता है…

बहाने अगर सच्चे हो तो चोट ज़रा कम लगेगी,

वर्ना झूठ की दीवारें तो हरदम गिरा करेंगी…

मैंने भी कुछ सच्चे बहाने बनाये है,

जो कई कड़वे झूठो को ढकते आये है,

कभी लगे बुरा मेरे बहानो का तो , नाराज़ भले हो लेना तुम,

पर सच्चे झूठ की तलाश में, कोई अपना मत खो देना तुम…

– इंद्रदत्त व्यास